भारत वर्ष मे शादी करना या हो जाना किसी महापर्व या महायग्य से कम नहीं. यहाँ शादी किन्ही दो व्यक्तिओं का समागम नहीं वरन दो परिवारों या कई रिश्तो का मेल होता हे. परन्तु जीवन के इस महायग्य मे अक्सर ऐसी यादें या घटनाए होती हे, जो जीवन की कभी ना मिटने वाली स्मृतियों मे से एक होकर रह जाती हे. किसी के विवाह का चित्रण अपने आप मे किसी बड़ी फिल्म की कहानी रचने से कम नहीं. इस में हर भाव हर द्रश्य का समावेश होता हे. विवाह मे सबसे विचित्र इस्तिथि वाले व्यक्तिओं मे से कुछ वर, वधु एवं वधु का पिता होते हे. पहले दो व्यक्ति तो महज़ कटपुतली होते हे, जो कभी पिताजी, कभी जीजाजी, या कभी भाभी जी के इशारों पर अजीब अजीब हरकते कर रहे होते हे. और अन्तिम व्यक्ति कर्जा ले कर शेयर बाज़ार मे सब कुछ ख़तम हो चुकी सी दशा में होता हे.
विवाह का दिन गीता मे युद्ध के अन्तिम दिन से कंचित मात्र भी कम नहीं होता. बारात जेसे ही विश्राम स्थल या जनमासे पर पहुचती हे , एक भयावय एवं अद्भुत द्रश्य प्रकट होता हे. बड़े मोसा जी सबसे पहले लड़की वालो द्वारा उनकी सेवा मे रखे गए नाइ के कौशल एवं ध्रेय की परीक्षा लेना शुरू करते हे. दाड़ी बनवाने से लेकर अपने सर पर बचे चंद बालो को देवानंद साहब की तरह सेट करवाने का प्रयत्न कर लेते हे. बाद मे उन्ही के रिश्ते नातेदारो द्वारा हटाए जाने का प्रयास देखकर, अपनी हठ प्रभुता का परिचय देते हुए अपने चर्बी युक्त एवं काल रात्रि सी छठा वाले शरीर की घिसाई उसके सलमान से कसाव एवं ऐश्वर्या सी श्वेत छठा आ जाने तक की मंशा लिए शुरू करवाते हे. परन्तु बड़े से बड़ा आदमी हारता आखिर अपनों से ही हे. बिचारे बड़े मोसा जी भी राजनीती मे बुडे हो चुके नेता जी , जो हमेशा अपनों के ही निशाने पर ही होते हे, इस प्रकार की इस्तिथि को भांप कर सन्यास का भाव लिए वो पदवी छोड़ देते हे.
परन्तु हमारे ताऊ जी जिन्होने बार बार खर्चा ना हो एस लिए पूरा जीवन रबर की लोकल चप्पल मे ही गुजार दिया, और पहली बार अपने भतीजे द्वारा दिए गए जूतों का उपभोग कर रहे थे. वो लगभग किसी बोहोत ही अनुभवी एवं बडे वैज्ञानिक का सा धेर्य लिए इन जूतों को नाना प्रकार से चमक वाने का प्रयतन करने मे लगे थे. बिचारा मोची भी अपने जीवन भर का अनुभव एवं कौशल उन जूतों मे झोक अब हर की अन्तिम सांसो को गिन रहा होता हे.
एक तीसरे ही द्रश्य मे सबसे एहम व्यक्ति यानि हमारे जीजाजी जो दोनों पक्ष के लोगो से नाराज अलग ही सभा जमाए बेठे होते हे. भाई बात भी सही हे! बस रुकने पर ना तो पहले उतारने का आग्रह किया गया और ना ही रास्ता दीया गया, और तो और शरबत का इनके सामने आने वाला ग्लास भी पंक्ति मे दूसरा था. अब इस अपराध पर खफा होना और जल्दी ना मानना तो हर जीजा का अपने साले की शादी मे लाज़मी हे.
अंततः बैंड वालो द्वारा आधे घंटे तक अपनी कला का जबरदस्त प्रदशन करवा लेने के बाद जब दुल्हे के पिता ये महसूस कर लेते हे की थोड़ी और हुई देर उनके इकलोते सुपुत्र के विवाह को बिना सुर ताल का कर सकती हे, बारात को रवाना हनी का इशारा किसी रेलवे के झंडी धारक अफसर की तरह करते हे. किसी तरह शुरू हुई ओप्चारिक्ताए कुछ पल बाद ही बड़ी मामी जी के द्वारा रोकी जाती हे, जो अपनी माधुरी और मीनाकुमारी के समागम वाली पुत्री के आए बिना बारात का आगाज ना होए का दम भरती हे. लड़की वालो द्वारा चाहू और का युद्ध कौशल प्रकट करने के पश्चात् बारात विवाह स्थल की और किसी सजी धजी चतुरंगिनी सेना की तरह कुच करती हे.
हमारे यहाँ सड़क पर चल रही बारात किसी मनोरंजक चलचित्र से कम नहीं होती हे. नाना प्रकार की फ़िल्मी धुने एवं उस पर अपने ही प्रकार का विचित्र नृत्य देखने सा बनता हे. सबसे खास कुच धुनों मे - आज मेये यार की शादी हे, ये देश हे वीर जवानों का एवं नगीन की मशहूर धुन होती हे, और इन सब मे जान फुकता रिशेत्दारो का नृत्य. नगीन की धुन पर शायद ही कोई नाग या नगीन आज तक बाहर आए हो परन्तु हमारे बरातियो मे से कुछ के अन्दर तो सच के सपेरे और नगीन सी छठा दिखने लगती हे. रुमाल से बनी बीन और शराब के नशे में लेट लेट कर सड़क साफ करना इस नृत्य की मुख्या धारा होती हे. वेसे इन सबके बिना हमारे देश मे शायद ही किसी शादी का चित्रण भी किया जा सकता हो. शादी मे आनंद का भाव होना उतना ही जरुरी हे जितना खाने में नमक. परन्तु ये भी हमारा कर्तव्य बनता हे की किसी भी शादी और किसी की भी शादी मे नमक इतना ना बड़ जाए की, उसकी कर्वाहट कुछ चंद लोगो के जीवन भर की व्यथा बन कर रह जाए.
--- लेखक: सौरभ श्रीवास्तव
दिनाक: १२-०६-२०११
स्थान: अपने घर का कमरा....!!!!!!!
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